ज्योतिःशास्त्र का वास्तविक अर्थ - Actual Meaning of Astrology

ज्योतिःशास्त्र का वास्तविक अर्थ – Actual Meaning of Astrology

Meaning of Astrology: ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति ज्योतिः शास्त्र से हुई जिसका अर्थ “ज्योति के प्रकाश से दृश्य होना” है | जिस प्रकार से अंधकार में दीपक के प्रकाश से वास्तविकता का ज्ञान होता है उसी प्रकार ज्योतिःशास्त्र द्वारा जीवन के वास्तविक तथ्यों का ज्ञान होता है |

विज्ञान के सिद्धान्तों के अनुसार इस पृथ्वी पर हर जीव और वस्तु ( जैसे मनुष्य/ जीव/ वृक्ष/ जलाशय इत्यादि ) गुरुत्वाकर्षण के अधीन हैं और प्रत्येक वस्तु एक दुसरे के अधीन है |

कहा गया है – Gravitational Force attracts everything on this earth and everything attracts each other.

उसी प्रकार यह नियम सौर मंडल पर भी लागू होता है जिसमें सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं जो किसी आकर्षण के बिना संभव ही नहीं है | अतः उन ग्रहों की परिक्रमा का केंद्र सूर्य ही है जिससे आकर्षण उत्पन्न होता है | सूर्य ही उस ऊर्जा का स्रोत है जिसके कारण ग्रह अपनी परिधि में रहने के लिए विवश हैं और सूर्य की परिक्रमा करते हैं | अब बात आती है ग्रहों में परस्पर होने वाले आकर्षण की |

जब ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं तो उनकी गति के कारण गुरुत्वाकर्षण में परस्पर टकराव होता है जिसका प्रभाव उन ग्रहों की अवस्था पर पड़ता है | पूर्णिमा और अमावस्या के दिन चंद्र और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में टकराव होने से समुद्र में ज्वारभाटा उठता है जो की इसका प्रमाण है | उसी प्रकार से अन्य ग्रहों का भी परस्पर एक दुसरे पर प्रभाव पड़ने से अनेक अंतरिक्ष घटनाएँ होती हैं |

इन सभी बातों से यह सिद्ध होता है की उपरोक्त विज्ञान का नियम (Macro and Micro Level) दोनों पर लागू होता है |

अब बात आती है पृथ्वी पर आश्रित प्रकृति और पुरुष की जो पृथ्वी के वातावरण के अधीन होते हैं | अतः सौर मंडल में होने वाली प्रत्येक गतिविधि का प्रभाव प्रकृति और पुरुष दोनों पर होता है |

इस प्रकार से ज्योतिःशास्त्र इन सभी भौगोलिक स्थितियों का अनुमान और गणना कर उनका प्रकृति और पुरुष पर होने वाले प्रभाव के अध्ययन से मनुष्य को ऐसे मार्ग पर गतिमान होने की सलाह देता है जिससे उसके जीवन में सकारात्मकता और सार्थकता का भाव आए |

उदहारण – जिस प्रकार सभी ग्रहों की क्रिया सूर्य अधीन है उसी प्रकार सभी ग्रहों की क्रिया परस्पर उनकी गति के अधीन है | ग्रहों और सूर्य के अधीन हमारी पृथ्वी है और पृथ्वी के अधीन प्रकृति और पुरुष है | इस प्रकार यह कड़ी आगे बढ़ती रहती है |

उदहारण से यह आशय है कि गतिमान रहना ही ब्रह्माण्ड का नियम है |

मनुष्य की गति (अर्थात कर्म या सक्रियता) ही फल देती है |

यदि गति न हो तो भी मनुष्य फल भोगता है क्यूँकि वह उस समय पृथ्वी की गति के अधीन रहता है |

यह तो वैसा ही है जब आप यात्रा के लिए बस में बैठते हैं और यात्रा की सफलता/ असफलता बस के अधीन होती है | ठीक इसी प्रकार हम समस्त प्राणी और जीव हमारे सौर मंडल के सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, पृथ्वी, वातावरण, प्रकृति, इत्यादि पर निर्भर हैं |

अब कई लोगों को यह जिज्ञासा होगी की यदि मनुष्य सक्रिय न भी हो तो भी उसे फल की प्राप्ति होगी | निश्चित ही होगी परन्तु फल अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी ; लेकिन यदि मनुष्य अपने परिश्रम से सही दिशा का चुनाव करे तो निश्चित ही सफलता प्राप्त करेगा | यहाँ दिशा से तात्पर्य यह है की जीवन में कार्य की सफलता मात्र परिश्रम से ही नहीं अपितु उसकी दिशा से भी तय होती है | मान लीजिये यदि कोई व्यक्ति कठोर परिश्रम कर रहा हो फिर भी उसे सफलता प्राप्त न हो रही हो, इस स्थिति में या तो वह दिशा उसके अनुरूप नहीं है या अत्यधिक परिश्रम करने की आवश्यता होती है |

इस प्रकार से मात्र गतिमान होने से ही नहीं वरन उचित दिशा के चुनाव से ही इस ब्रह्माण्ड से सकारात्मक फल पाया जा सकता है |

ज्योतिष शास्त्र मनुष्य को उसी दिशा का ज्ञान देता है जो उसके अनुरूप हो, योग्य हो |

यही ज्योतिष विद्या का वास्तविक अर्थ है | 

 

2 thoughts on “ज्योतिःशास्त्र का वास्तविक अर्थ – Actual Meaning of Astrology

  1. Dear Bhavishyagyan Team,

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    I really appreciate your very sincere efforts for this kind of good work.

    Regards
    Unknown

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